पाठ 1: स्वदेश (कविता)
कविता की पंक्तियों के भावार्थ
1) “वह हृदय नहीं……. कुछ सार नहीं।”
भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियों में कवि गयाप्रसाद शुक्ल कहते हैं कि वह हृदय नहीं, पत्थर है जिसमें स्वदेश (देश) के लिए प्यार न हो। जो व्यक्ति दूसरों में जीवित जोश नहीं जगा सकता, उसके जीवन का कोई मतलब (सार) नहीं है।
2) “जो चल न सका……. सकेगा पार नहीं।”
भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कहते हैं कि जो व्यक्ति संसार के साथ नहीं चल सका, उसका यह संसार नहीं हो पाता। जिसने अपने साहस को छोड़ दिया है, वह कभी अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकता (पार नहीं पहुँच सकेगा)।
3) “जिससे न जाति-उद्धार……. रस-धार नहीं।”
भावार्थ: (छात्र की समझ के अनुसार) जो व्यक्ति जात-पात में विश्वास करता है, वह लोगों को एक समान नहीं देखता और वह कभी सफल नहीं होता। जो व्यक्ति दूसरों का दुख देखकर पिघलता नहीं है, उसका दिल कठोर है और उसमें रस की धारा नहीं बहती।
4) “जिसकी मिट्टी में उगे……. राजा-रानी।”
भावार्थ: हम जिस देश में रहते हैं, हमारा जन्म भी उसी देश में हुआ है और हम उसी देश में पले-बढ़े हैं। इस देश में हमारे माता-पिता और बंधु रहते हैं, हम इस देश के राजा-रानी हैं और सैनिक हमारी रक्षा करते हैं।
5) “जिसने कि खज़ाने……. दीवानी।”
भावार्थ: हमारे देश में अनेक खज़ाने हैं और हमारे देश ने बहुत से नवरत्न दिए हैं (जैसे शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज)। इस देश पर ज्ञानी लोग भी मरते हैं और पूरी दुनिया इसकी दीवानी है।
6) “उस पर है नहीं पसीना……. एक दिन जाने को।”
भावार्थ: इस देश ने हमें सब कुछ दिया है, फिर भी जिन लोगों के मन में देश के लिए प्रेम उत्पन्न नहीं होता और कमज़ोर को देखकर जिनका हृदय पिघलता नहीं है, ऐसे लोग धरती (भू) पर भार के समान हैं। कवि कहते हैं कि यह निश्चित है कि एक-न-एक दिन सभी को मरना है, तो फिर अपने देश के लिए कुछ करके क्यों न मरें।
7) “है काल दीप……. तलवार नहीं।”
भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियों में कहा गया है कि जिस प्रकार दीये को जलाए रखने के लिए परवाना खुद को समर्पित कर देता है, उसी प्रकार देशभक्त अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हर पल तैयार रहता है। जिस प्रकार युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए तोप और तलवारों की ज़रूरत होती है, उसी तरह मनुष्य को अपनी प्रगति के लिए साहस और इच्छाशक्ति की ज़रूरत होती है।
प्रश्न: “हम हैं जिसके राजा-रानी” किसे और क्यों कहा गया है?
उत्तर: “हम हैं जिसके राजा-रानी” देश के नागरिकों को कहा गया है क्योंकि इस देश के नागरिक स्वतंत्र हैं।
प्रश्न: “संसार-संग” चलने से आप क्या समझते हैं? जो व्यक्ति ‘संसार-संग’ नहीं चलता, संसार उसका क्यों नहीं हो पाता है?
उत्तर: “संसार-संग” चलने का अर्थ है अपने देश के लिए कुछ करना। जो व्यक्ति संसार-संग नहीं चलता है, संसार उसका नहीं हो पाता क्योंकि हम इसी देश में रहते हैं, तो हमें देश के लिए कुछ तो करना ही पड़ता है।
प्रश्न: “उस पर है नहीं पसीना जो, क्या है वह भू का भार नहीं।” से आप क्या समझते हैं? बताइए।
उत्तर: इन पंक्तियों में कहा गया है कि यदि व्यक्ति में आगे बढ़ने का जज़्बा नहीं है, तो वह सिर्फ धरती पर एक भार है और वह कुछ नहीं कर सकता।
प्रश्न: कविता में देश-प्रेम के लिए बहुत-सी बातें आई हैं। आप देश-प्रेम से क्या समझते हैं? बताइए।
उत्तर: देश-प्रेम का अर्थ है अपने देश के प्रति प्रेम, सम्मान या समर्पण। इसमें देश की रक्षा करना, उसके विकास में योगदान देना और उसकी संस्कृति का आदर करना शामिल है।
प्रश्न: यह रचना एक आह्वान गीत है जो हमें देश-प्रेम के लिए उत्साहित करती है। इस रचना की अन्य विशेषताएँ ढूँढ़िए और लिखिए।
उत्तर:
- यह कविता एक आह्वान गीत है जो हमें देश-प्रेम के लिए प्रेरित करती है।
- इसकी भाषा सरल व प्रभावशाली है।
- इसमें देशभक्ति, उत्साह और प्रेरणा का भाव है।
- यह कर्तव्य निभाने और देश के लिए कुछ करने की सीख देती है।
प्रश्न: “जिसने कि खज़ाने खोले हैं” अनुमान करके बताइए कि इस पंक्ति में खज़ाने की बात क्यों की गई है।
उत्तर: इस पंक्ति में खज़ाने का अर्थ देश की प्राकृतिक संपदा से है, जैसे— खदानें, पर्वत और नदियाँ आदि।
प्रश्न: “जिसकी मिट्टी में उगे-बढ़े” पंक्ति में ‘उगे-बढ़े’ किसके लिए और क्यों कहा गया होगा?
उत्तर: इन पंक्तियों में ‘उगे-बढ़े’ देश के नागरिकों के लिए कहा गया है क्योंकि हम इसी देश के निवासी हैं और इसी देश में पले-बढ़े हैं।
प्रश्न: “वह हृदय नहीं है पत्थर है” पंक्ति में हृदय के लिए ‘पत्थर’ शब्द क्यों कहा गया है?
उत्तर: इस पंक्ति में उस व्यक्ति के हृदय को पत्थर कहा गया है जो देश की रक्षा नहीं करता और जिसके मन में देश के लिए कोई भाव नहीं है।
